बिहारी के दोहे और उनकी व्याख्या

Bihari Ke Dohe | Bihari Ke Dohe Arth Sahit

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bihari ke dohe

बिहारी के दोहे को गागर में सागर की उपमा दी जाती है। यानी कि कम शब्दों में बिहारी के दोहे अपने सम्पूर्ण भाव को प्रकट कर जाते हैं। बिहारी के दोहे की ब्याख्या आज हम देखेंगें। बिहारी के दोहे का संकलन सतसई के नाम से जाना जाता है। बिहारी के जीवन परिचय की बात की जाय तो ये शाहजहाँ के समकालीन राजा जय सिंह के दरबारी कवि थे।

बिहारी का जन्म 1595 में ग्वालियर में माथुर चतुर्वेदी ( ब्राह्मण ) परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवराय था। इनका बाल्यकाल ओरछा बुंदेलखंड में बीता और इनका विवाह मथुरा में हुआ था। इनके गुरु का नाम नरहरिदास था।
बिहारी के दोहे मूलतः ब्रजभाषा में लिखे गए हैं परन्तु इनमें पूर्वी हिंदी, बुंदेलखंडी, उर्दू, फ़ारसी आदि के शब्दों के साथ अलंकारों का भी समावेश देखने को मिलता है।

बिहारी के दोहे अपने गूढ़ और भावपूर्ण अर्थ के लिए जाने जाते हैं। आइये बिहारी के कुछ दोहों के नमूने देखते हैं।

बिहारी के दोहे की ब्याख्या

“अधर धरत हरि के परत. ओंठ दीठ पट जोती,
हरित बांस कि बाँसुरी, इन्द्रधनुष दुति होती|”
ब्याख्या :- इस दोहे के माध्यम से कविवर बिहारी कहते हैं कि जब भगवन श्रीकृष्ण अपने लाल अधरों (ओष्ठ) पर हरे रंग कि बांस से बनी बांसुरी रखते हैं तो ओष्ठ का लाल रंग, बांसुरी का हरा रंग और उनके द्वारा धारण किये गए पीले रंग के वस्त्र कि छाया, और नेत्रों का कला वर्ण मिलने से बांसुरी का रंग इन्द्रधनुष के रंग के सामान प्रतीत होता है।

“मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाई परे, स्याम हरित दुति होय॥”

ब्याख्या :- इस दोहे के माध्यम से कविवर बिहारी श्रीराधा जी से अपने सुखमय जीवन की कामना करते हैं और कहते हैं कि हे श्री राधे जी मेरे जीवन में खुशहाली प्रदान करके मेरे कष्ट और बाधा को वैसे हीं दूर करें जैसे मेरे आराध्य श्री कृष्ण आपके छाया मात्र से अर्थात आपके सानिध्य मात्र से श्याम वर्ण से हरे वर्ण के हो जाते हैं यानी प्रफुल्लित हो जाते हैं।

अर्थात मेरे भी जीवन में आप अपना स्नेह और सानिध्य बनायें रखें तथा मेरे हर तरह के बाधा, बिघ्न और कास्ट का हरण करें।

“कनक कनक ते सौं गुनी मादकता अधिकाय।
इहिं खाएं बौराय नर, इहिं पाएं बौराय ।।”

ब्याख्या :- इस दोहे के माध्यम से कविवर बिहारी कहते हैं कि धतुरा और सोना में अगर तुलना की जाय तो धतूरे से सोने में अधिक मादकता (नसा) होती है क्यूंकि धतुरा को खाने के बाद इन्सान पागलों कि भाँती ब्यवहार करने लगता है परन्तु सोना को तो पाने मात्र से पागलों कि भाँती ब्यवहार करता है, अर्थात अभिमान से युक्त हो जाता है।

“बढत बढत संपत्ति सलिल मन सरोज बढि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटे बरु समूल कुमलाय ॥”

ब्याख्या :- इस दोहे के माध्यम से कविवर बिहारी कहते हैं कि संपत्ति अर्थात धन दौलत के बढ़ने के साथ मनुष्य का मन उसी प्रकार बढ़ता चला जाता है जैसे सरोवर में कमल, सरोवर के बढ़ते जल के साथ कमल कि डंठल भी बढती चली जाती है ताकी कमल जल के सतह पर रह सके, परन्तु सरोवर के जल के कम होने पर भी कमल कि डंठल नीचे नहीं आ पाती।

ठीक वैसे हीं मनुष्य का मन संपत्ति के साथ तो बढ़ता है परन्तु संपत्ति के घटने के साथ घटता नहीं है भले हीं कमल के फूल के समान कुम्हला जाय अर्थात नष्ट हो जाय।

“कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात।
कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात॥”

ब्याख्या :- इस दोहे के माध्यम से कविवर बिहारी नें नायक के प्रति नायिका के बिरह बेदना और प्रेम को अद्भूत ढंग से दर्शाया है। जिसमें बिरह की बेदना के साथ लोक लाज का भी समावेश देखने को मिलता है।

इस दोहे में नायिका सन्देश वाहक से कहती है कि अपने मन कि बात तुम्हें बताने में लज्जा आ रही है कांपते हुए हाँथ साथ नहीं दे पा रहें हैं ताकि मैं अपना सन्देश लिख पाऊं अतः हे सन्देश वाहक मेरी स्थिति तुम देख हीं रहे हो अतः उन्हें, मेरे ह्रदय की बात समझ कर अपने ह्रदय से महसुस कर वो सबकुछ कह देना जो मैं कहना चाहती हूँ।

“पत्रा ही तिथि पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पुनयौई रहै, आनन-ओप-उजास ।।”

ब्याख्या :- इस दोहे के माध्यम से कविवर बिहारी नें नायिका के अद्भूत सौन्दर्य का वर्णन किया है। इस दोहे में कविवर बिहारी का नायक अपने नायिका के सौन्दर्य की उपमा पूर्णिमा के चन्द्रमा से करते हुए कहता है कि नायिका के चेहरे में उसके सौन्दर्य का इतना तेज़ है कि उसके घर के चारो तरफ उजियारा फैला रहता है जो पूर्णिमा होने का भ्रम देता है। लोगों को भ्रमवश पंचांग देखना पड़ जाता है कि कहीं आज पूर्णिमा तो नहीं।

“सोहत ओढ़ैं पीतु पटु स्याम ,सलौनैं गात।
मनौ नीलमनि -सैल पर आतपु परयौ प्रभात।।”

ब्याख्या :- इस दोहे के माध्यम से कविवर बिहारी नें भगवन श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन किया है। कविवर बिहारी कहते हैं कि जब भगवन श्रीकृष्ण पीले वर्ण का वस्त्र धारण करते हैं तो उनके श्याम (सांवले) शारीर पर ऐसा प्रतीत होता है मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह सुबह की सूर्य कि किरणें पड़ रही हों।

“कहलाने एकत बसत अहि मयूर ,मृग बाघ।
जगतु तपोबन सौ कियौ दीरघ -दाघ निदाघ।।”

ब्याख्या :- इस दोहे में कविवर बिहारी नें भीषण गर्मी का वर्णन किया है वे कहते हैं कि ऐसी भीषण गर्मी है कि गर्मी से ब्याकूल होकर एक ओर सर्प और मयूर वहीं दूसरी ओर बाघ और हिरण आपसी सत्रुता को भूल कर एक साथ बैठे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों किसी तपोवन में बैठे हैं जहां आपसी सत्रुता का कोई स्थान नहीं होता।

“बैठि रही अति सघन बन ,पैठि सदन – तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की छाँहौं चाहति छाँह।।”

ब्याख्या :- इस दोहे में कविवर बिहारी नें भीषण गर्मी का वर्णन किया है। कविवर कहते हैं कि ज्येष्ठ माह कि इस भरी दोपहरी में इतनी भीषण गर्मी है कि छाया भी छाया ढूँढ रही है। जो किसी भवन या किसी घने वन में प्रवेश करने के बाद हीं प्राप्त हो सकती है।

“प्रगट भय  द्विजराज – कुल ,सुबस बसे ब्रज आइ।
मेरे हरौ कलेस सब ,केसव केसवराइ।।”

ब्याख्या :- इस दोहे में कविवर बिहारी भगवन श्रीकृष्ण से अपने दुखों का हरण करने की प्रार्थना करते हैं। कहते हैं कि आपने चन्द्र वंश में जन्म लिया है और अपनी इक्षा से आपने ब्रज में निवास किया। आप केशव के नाम से जाने जाते हैं और मेरे पिता का नाम भी केशव राय है। अतः हे प्रभु मेरे पिता के समान हीं मेरे कष्ट का हरण करें।

“जपमाला ,छापैं ,तिलक सरै न एकौ कामु।
मन – काँचै नाचै बृथा साँचै राँचै रामु।।”

ब्याख्या :- इस दोहे में कविवर बिहारी कहते हैं आडम्बर और बाहरी दिखावा करके इश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। ब्यर्थ का माला जपना, छापा और तिलक लगाना सब व्यर्थ है। जब तक मन कच्चा है अर्थात मन में भाव नहीं है तब तक सब ब्यर्थ है। राम को अर्थात इश्वर को सच्चे भाव से हीं पाया जा सकता है अर्थात प्रसन्न किया जा सकता है।

ऐसे हीं बिहारी नें अपने सतसई में 719 दोहों कि रचना कि है जो मनोरंजक के साथ साथ कम शब्दों में गूढ़ भाव उत्पन्न करते हैं।

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